सरहदें खिंची थीं महज़ काग़ज़ के पन्नों पर,
सर कटकर गिरे हक़ीक़त की ज़मीं पर।
ज़ुल्म के ख़िलाफ़ मिलकर लड़ी थी लड़ाई,
दो मुल्कों में बँट गए वही दोस्त और भाई।
कितने जानते, कितने समझते उस मंज़र को,
रूह तक दहला देने वाला था वो ख़ौफ़नाक मंज़र।
पुरखों की गूँजती रहीं कोने कोने में
सिसकियाँ
उजड़े कैसे आशियाने, कैसे छूटीं अपनी गलियाँ।
मौत का तांडव देख जो जान बचाकर आए,
बरसों रिफ़्यूजी कैंपों में उन परिवारों ने दिन बिताए।
तार-तार कपड़ों में अस्मत बचाती रहीं बहनें,
लूट ले गए अपने पराए बची-खुची पूँजी और गहने।
खींचने वाले ने तो बस एक लकीर थी खींची,
पर लाखों ज़िंदगियों की तक़दीर नोंच ली।
इंसानों पर आदमियों का ऐसा टूटा क़हर,
शर्मसार हुआ इतिहास, सिसकता रहा हर शहर।
आज जिस आज़ाद फ़िज़ा में हम साँस लेते हैं,
क्या उस आज़ादी की क़ीमत कभी याद करते हैं?
आज़ादी यूँ कोई तोहफ़ा नहीं मिला,विरासत है हमारी,
इसके पीछे छिपी है शहादत बेहद भारी।
सरहद की लकीर रहे, दिलों में नफ़रत ना खिंची जाए
अमन और इंसानियत के रिश्ते कभी न टूटने पायें
बहुत भारी चुकाई गई थी इंसानियत की क़ीमत,
उन पुरखों की अज़मत।
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