जी लेने दो जी भर के इक-दूजे को,
इस महफ़िल में चंद दिनों के मेहमान हैं हम।
भेजा है उस रब ने इस धरती पर,
किसी नेक मक़सद का पैग़ाम हैं हम।
विवेक, सद्बुद्धि और सद्भावना का संगम हो,
जग में बस ऐसा ही उजियारा रहे।
जोड़ते चलें हम नेकी की कड़ियाँ हरदम,
भीड़ में भी हीरे-सी अपनी पहचान रहे।
हक़ के सिवा कहीं और ये नज़रें न उठें,
मेहनत की हर पाई बरकत से सजे।
उस पाक नाम से दूरी न हो कभी,
उसके साये में सदा मुस्कुराते रहें सभी।
आदमी के आगे क्या गिड़गिड़ाना,
आख़िरी सफ़र भी औरों के कंधों पर ही होता है।
नतमस्तक होना हो तो सिर्फ़ उसके आगे,
वही खाली झोलियों को रहमत से भरता है।
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