यादों के सहारे घुटें कब तक, और क्यों भला,
चले आओ, तारों तले आज मिल लें ज़रा।
अपने-अपने चाँद से हो जाएगी फिर मुलाक़ात,
मौसम का क्या—कभी बादलों की ओट, कभी बरसात।
यह तो हर रंग में ग़ज़ब चमकता, इतराता है,
इसका नूर बाक़ी सबको धुंधला कर जाता है।
शिकवे-शिकायतें भी करेंगे चाँद की अदालत में,
निगाहों के इशारों में छुपी होंगी सारी बात।
ज़मीं की दूरियों को भुला दिया जाए कुछ पल के लिए,
आसमाँ के साए तले मुस्कुराए यह कायनात।
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