आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मैं पुस्तक हूं

                
                                                         
                            कचरे का ढेर नहीं मैं पुस्तक हूं।
                                                                 
                            
तुम्हारे सुंदर जीवन की दस्तक हूं,
भरी हूं शब्दों से पर शोर नहीं हूं मैं,
तुम्हारे मन में जागे तूफानों का अंतिम छोर हूं मैं,
मेरा हृदय उन बंद पन्नों पर दबकर सिसक रहा है,
अब जीवन मेरा वेदना से कसक रहा है,
मेरी रूह को टटोलकर तुमने दुनिया को जाना था
मुझसे ही लेकर रोशनी तुम मुझसे भी आगे राहों पर बढ़े,
मगर अफसोस आज मंजिल पाते ही तुम मुझे भूल गए,
मेरा वजूद ही मिट्टी में मिला गए
-रानी पुंडीर 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर