प्रकृति तेरा एहसास अनूठा है
जो भी है तेरे आसपास अनूठा है,
महक उठता है चमन सारा
जिदंगी संग तेरा महारास अनूठा है।
तेरा अपना तो कोइ रूप नहीं
फिर भी तेरे असंख्य स्वरूप दिखते हैं,
रम जाता है तुझमें सारा जहाँ
मदमस्त तेरा सुवास अनूठा है।
मानवता के सुत्रधार हो,
सभ्यता के मूर्तिकार हो,
पाहन पर्वत,क्षितिज की कीरणें
जंगल दरिया और चास अनूठा है।
करतल ध्वनि गुंजायमान है
मदमोहक महक रसायन है
रंग बिरंगे पैरहन बिछावन,
अद्भुत तेरा मोहपाश अनूठा है।
दीप्ति पुन्ज प्रज्वलित हो रहा,
विस्तीर्ण ब्रह्माण्ड प्रफुल्लित हो रहा,
तादात्म्य, निर्मलता, शुद्धता,
निरंतर तेरा प्रभाष अनूठा है।
अणु अणु भिन्न भिन्न है,
शक्ति तेरी अजर अक्षुण्ण है,
उपकार, प्रतिकार के संग संग,
स्निग्ध दृष्टिऔर संत्रास अनूठा है।
आह्लादित सम्मोहित करता,
भर तरंग उत्साहित करता,
निखारता छिपे सौन्दर्य को,
तेरा दिया हुआ आस अनूठा है।
असंख्य जीव जन्तु हो समेटे हुए,
अगनित धरा हो हाथ लपेटे हुए,
भृत्य नृप सबके एक नियम बांधे,
तेरा वसंत और मधुमास अनूठा है।
अरूणिमा सुबह की स्याह निशा की,
भाव भंगिमा तृप्ति और तृषा की
आवश्यकता भर सृजन संवर्द्धन,
तेरा वास और प्रवास अनूठा है।
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