हम कहाँ जीत पाते हैं,
हम तो बस हार के रह जाते हैं,
होगे बिरबान जो जीत जाते हैं,
हम तो फुफकार के रह जाते हैं।
कोई एकबार में जीत जाता है,
कोई इनकार में जीत जाता है,
पता नहीं किसका ईशारा है,
हम तो एकरार के रह जाते हैं।
फिर मुझे ऐसा क्या चाहिए,
वो सिर्फ मेरे दयार को पता है,
जब होती है जरूरत तरफदार की,
हम उस पार के रह जाते हैं।
ऐसी कितनी ही कहानी सुनी,
पाँव और पत्थरों के संघर्ष की ,
जिसमें पांओ को जीतते देखा गया,
हम दर्द के दरकार के रह जाते हैं।
त्योरियां चढ़ी मालूम पड़ती है,
घिस घिस कर जादुई चिराग,
पता नहीं किसने रखा मेरे तरफ,
हम झखमार के रह जाते हैं।
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