सचमुच संसार में ना ही अच्छा का ना ही बुरा का करते हुए चुनाव,
बहुत ही छोटा हो या बहुत ही बड़ा सब में रखते हुए समभाव,
स्वयं को दृष्टा और बाकी मन इंद्रिय शरीर सब को दृश्य समझ कर,
योगी स्वयं को जानने हेतु खुद में विकसित करता है साक्षी भाव|
-मनस्व
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