बात इस जीवन की हो या फिर कि हो उस जीवन की,
बात बाहरी इंद्रियों की हो तन की हो या फिर अंतर्मन की,
बात की जाए मन की बात से इन सबके संबंधों की तो,
मन की बात बन कर रह जाती है सदा केवल बात मन की|
-मनस्व
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