हे खुद को श्रेष्ठ समझने वाला मनुष्य कब तक तू फंसा रहेगा जीवन मरण के इस चक्रव्यूह में,
जहां तू जीवन को देख होता है आनंदित वही मौत को देख कंपकपी छा जाती है तेरी रूह में,
सचमुच तेरा तो स्थान होना चाहिए स्व भक्तों को सदा स्व हृदय में रखने वाले प्रभु के हृदय में,
ना कि भव सागर रुपी, जीवन और मरण रूपी, स्वयं प्रभु की ही बनाई झूठी माया के मुंह में|
-मनस्व
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