कभी लगता है उड़ रही है यह हवाओं के संग जी,
कभी लगता है कर रही है यह हवाओं से जंग जी|
कभी लगता है कर रही है यह हवाओं को तंग जी,
कभी लगता है हवाएं उड़ाए ले जा रही हैं पतंग जी||
सुनकर हो सकता है हो जाओ तुम दंग जी,
हो सकता है तुम्हारे चेहरे का उड़ जाए रंग जी|
यदि तुम सीखना चाहते हो इसे उड़ाने का ढंग जी,
ध्यान रखो जरा भी मन की एकाग्रता न हो भंग जी||
-मनस्व
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X