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कहमुकरी संरचना में ग़ज़ल

                
                                                         
                            पहले मोकूँ चूम ललाम, फिर लोटत डोल्यौ वो पाम
                                                                 
                            
गिरौ पेड़ से सुन सखि फूल, चल झूठी पति होंगे शाम।

चमकी चपला नभ के बीच, तुरत गयी मैं आँखें मींच
ली मैंने झट बल्ली थाम, सखि ना छुपा सजन कौ नाम।

पीत वसन में सुन्दर गात, रस दे मीठा अधर लगात
महँक उठे मन-बदन तमाम, का सखि साजन? ना सखि आम।

भरी दुपहरी पहुँची बाम, चाट गयी तन-मन को घाम
पिया मिले होंगे गुलफाम? क्या बोले सखि हाये राम!

अगर मिले तो चित्त सुहाय, पास न हो तो मन मुरझाय
रोज बनाये बिगड़े काम, का सखि साजन? ना सखि दाम।
 
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3 महीने पहले

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