पेट की भूख…!
जब आत्मा तक पहुँचती है
काल जयी भी उच्छ स्वांस लेता है
निचुड़ सा जाता है मन
तन की तो बिसात ही क्या…!
पेट की भूख…!
जब आत्मा तक पहुँचती है ।
भुला जाते हैं रिश्ते नाते
कभी सदृश्य तो कभी अदृश्य
चुन कर उठाने पड़ते हैं
खून के रिश्ते भी डरते हुए
कहीं तलहटी से निकल न आएँ
वैचारिक गाँठों के कैंचुए
अपनत्व की तो बिसात ही क्या…!
पेट की भूख…!
जब आत्मा तक पहुँचती है
छिपी समाजिक कुंठाओं की
वेग पूरित घुमड़ती आधियाँ
और मानसिक द्वेषों का संवेग
पीड़ाओं के तरल द्रव्य सी
बहती नदियों के संग अब
ये काया भी बह चली है
अंतस की तो बिसात ही क्या…!
पेट की भूख…!
जब आत्मा तक पहुँचती है
बाल वृन्द और सगे पराये
वहाँ-यहाँ सब दृश्यमान हैं
निकट सनेही कही न दिखते
जो भी दिखते सबकी दृष्टि
धन दौलत की ओर गढ़ी है
क्या देगा ये क्या हम ले लें
सम्बन्धो की तो बिसात ही क्या…!
पेट की भूख…!
जब आत्मा तक पहुँचती है
श्मशानों के भव सागर में
इधर अर्थियाँ उधर अर्थियाँ
कोई धन की भूख मर गया
कोई तन के आपे से
किसी ने मन का आपा खोया
कोई सम्बन्धों की मौत मरा
अधर्म की तो बिसात ही क्या…!
पेट की भूख…!
जब आत्मा तक पहुँचती है
काल जयी भी उच्छ स्वांस लेता है
निचुड़ सा जाता है मन
तन की तो बिसात ही क्या…!!
पेट की भूख…!
जब आत्मा तक पहुँचती है ।
जब आत्मा तक पहुँचती है ॥
-रमेश चन्द्र
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