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चाट के पत्ते

                
                                                         
                            चाट के पत्ते…
                                                                 
                            
सड़क के किनारे चाट की रेहड़ी
पास ही कचरे में पड़े चाट के पत्ते
दही बड़े की दही से सने हुए कुछ
सौंठी चिपकन में चिपके हुए कुछ
बताशे वाले पानी से धुले हुए कुछ
यूँ ही बगड-तगड़ से फैले हुए कुछ
सड़क के किनारे चाट की रेहड़ी
पास ही कचरे में पड़े चाट के पत्ते…।

अपनी धुन में बातें करते हों जैसे
हँसते हुए खिलखिला रहे हों जैसे
दूर तलक कुछ पतझर जैसे फैल गए
खेल खेल में दौड़ गए हों बालक जैसे
पत्तों के झुरमुठ में बच्चों जैसा कलरव
हर कोई नहीं कर पाता ऐसा अनुभव
सड़क के किनारे चाट की रेहड़ी
पास ही कचरे में पड़े चाट के पत्ते…।

मन में एक विचित्र सी अनुभूति
कैसा है ये भी एक जीवन चक्र
पानी पूरी दही बड़े के खट्टे मीठे
स्वाद को साथ लिए फैंका जाना
और पत्तों की भीड़ में गिर जाना
भीड़ में ही फिर गडमड हो जाना
सड़क के किनारे चाट की रेहड़ी
पास ही कचरे में पड़े चाट के पत्ते…।

स्वाभाविक सी जिज्ञासा भरा प्रश्न
तुम कहाँ से और कौन हो वत्स!
पल भर मौन, थरथराती सी हलचल
एक दूसरे के डंठलों को देख कर
चंचलता से भरी अस्फुट उत्सुकता
मेरी दृष्टि को समझने की चेष्टा
सड़क के किनारे चाट की रेहड़ी
पास ही कचरे में पड़े चाट के पत्ते…।

उनके बीच पड़े हुए कुछ बड़े और
पुष्ठ पत्ते ने बड़े मर्यादित भाव से
प्रश्न का उत्तर देने का यत्न किया
जी ! मैं पलाश, पहाड़ी हूँ पर नहीं नितांत
कुछ अन्य भी हैं साथ मध्य और उत्तर के
थोड़े यू पी के ‘ढाक’ और कुछ बिहार के
सड़क के किनारे चाट की रेहड़ी
पास ही कचरे में पड़े चाट के पत्ते…।

पर तुम कौन ! और क्यों ये सब जानना है?
तुम्हारी मुखाकृति से लगता है, लेखक हो !
तुमसे पहले भी कुछ आये थे तुमही सरीखे
‘लिखा’ कि ‘छपा’ पर वापिस न कोई लौटा
समझ बूझने का तो नहीं कोई हमे भान होता
हमारा तो यही जीवन है चाट के पत्तों जैसा
सड़क के किनारे चाट की रेहड़ी
पास ही कचरे में पड़े चाट के पत्ते…।

उत्तर मैं समाहित प्रश्न ! अचकचाया मैं
अनुत्तरित सा, मैं पत्ते के उस सवाल पर
प्रकृति के रूप का यह भी एक पहलू है
जैसा भी हो जीवन, हमें जीना ही होता है
कर्मों के लेखे का भोग भी पीना होता है
ढाक पातों से जाना जीवन कैसा होता है ।
जीवन कैसा होता है जीवन कैसा होता है॥
सड़क के किनारे चाट की रेहड़ी,
पास ही कचरे में पड़े ‘चाट’ के पत्ते…
ढाक’ के पत्ते , नहीं बस चाट’ के पत्ते,
नहीं बस चाट’ के पत्ते, नहीं बस…॥
 
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2 महीने पहले

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