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सोंचता हूॅं कुछ बड़ा कर लूं

                
                                                         
                            कुछ बड़ा कर लूं
                                                                 
                            

सोचता हूॅं!
जिंदगी में
कुछ बड़ा कर लूं
बूंद बूंद ही सही
घड़ा भर लूं।

चल पड़ी जिंदगी
बढ़ चला मैं
शादी हुई
बच्चे हुए
सोंचा!
पहले
बच्चों को बड़ा लूं,
सोचता हूॅं!
जिंदगी में
कुछ बड़ा कर लूं।

बढ़ती जिंदगी की
गति धीमी हुई
सपने बड़े
सोंचा
धन दौलत
सम्पत्ति सम्पदा
तो जमा कर लूं
सोचता हूॅं!
जिंदगी में
कुछ बड़ा कर लूं।

चलते-चलते
थम गयी जिंदगी
बंद हो गयी आंखें
टूटे गये सपनें
हाथ खाली
देखते देखते
सब राख हो गये
मैं भी सपने भी
बच्चे बोले
क्रियाक्रम से पहले
धन बटवरा कर लूं
सोचता हूॅं!
जिंदगी में
कुछ बड़ा कर लूं।
-रामवृक्ष बहादुरपुरी
 
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एक घंटा पहले

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