आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मैं पढ़ूंगी

                
                                                         
                            मैं पढ़ूंगी
                                                                 
                            

पापा!
मुझे नहीं चाहिए “ नयी किताबें”
मैं पढ़ लूॅंगी “ पुरानी “ या
मांगी हुई “ किताबों ” से,
मैं नहीं देख पाती हूॅं मेरे लिए
आप की “ तपस्या”
आप का “ त्याग “
किन्तु,
हार न मानने की आप की “ सलाह “
आगे बढ़ने की “ प्रेरणा “
मुझे आगे बढ़ाता है,
लोगों के तानें ,मजे,हॅंसी कि
“ मैं बेटी हूॅं “
क्या करूंगी पढ़कर?
मुझे मजबूत करते हैं “ जीतने के लिए”
पापा!
मैं आप की “ भरोसा” हूॅं
आप का विश्वास हूॅं
मैं पढ़ूंगी, बढ़ूंगी
मिटाऊंगी बेटा - बेटी के बीच की भेद
मिटेगीं आप की मजबूरियाॅं।
-रामवृक्ष बहादुरपुरी
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर