मैं पढ़ूंगी
पापा!
मुझे नहीं चाहिए “ नयी किताबें”
मैं पढ़ लूॅंगी “ पुरानी “ या
मांगी हुई “ किताबों ” से,
मैं नहीं देख पाती हूॅं मेरे लिए
आप की “ तपस्या”
आप का “ त्याग “
किन्तु,
हार न मानने की आप की “ सलाह “
आगे बढ़ने की “ प्रेरणा “
मुझे आगे बढ़ाता है,
लोगों के तानें ,मजे,हॅंसी कि
“ मैं बेटी हूॅं “
क्या करूंगी पढ़कर?
मुझे मजबूत करते हैं “ जीतने के लिए”
पापा!
मैं आप की “ भरोसा” हूॅं
आप का विश्वास हूॅं
मैं पढ़ूंगी, बढ़ूंगी
मिटाऊंगी बेटा - बेटी के बीच की भेद
मिटेगीं आप की मजबूरियाॅं।
-रामवृक्ष बहादुरपुरी
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