आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हाॅं मैं उस समाज की बेटी हूॅं

                
                                                         
                            मैं
                                                                 
                            
उस समाज की बेटी हूॅं
जहां पैदा होने पर
लोग खुश होते हैं कि-
“ बनाने खिलाने वाली आ गयी ”
बड़ी होने पर हाथों में
चौका बेलन थमा दिया जाता है,
शादी विवाह के मौके पर
कौन पूछता है डिग्रियां?
बस बनाने खिलाने वाली हो,
हां खाना अच्छा बनाती है
सारा काम अच्छे से कर लेती है
घर यही सम्हालती है,
फिर पूरा जीवन
सेवा भाव में बांट देती हूॅं।
मर्यादा का घूंघट
ओंठो पर मुस्कान
मन पर बोझ
अंतर्मन में सन्नाटा
सपनों के अंत के जंजीर से बंधी
आशा के पुल बांधती
जीवन काट देती हूॅं
-रामवृक्ष बहादुरपुरी
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर