माई डाटैं बापू डाटैं
भेजैं स्कूलवा हो
खेली कूदी भागी दौड़ी
झूली दिन भे झूलवा हो
दिन भर कै सारी बतियां,देखी ला सपनवा हो
एक बार अउरौ अउतै, फिर से बचपनवा हो।
नाहि रहैं दुश्मन कोई
न कोई बेगनवा हो
बागि-बागि तोरी अमवा
सुबह दुपहर शमवा हो
कउड़ा में भूंजी आलू,भूंजी मटर चनवा हो,
एक बार अउरौ अउतै, फिर से बचपनवा हो।
नाहि भूलै नाचि बाजा
गाॅंव कै मदरिया हो
ठुमका लगाई कै जब
नाचै ली बदरिया हो
सुनित आल्हा लोकगीत,रेडियो कै गनवा हो,
एक बार अउरौ अउतै, फिर से बचपनवा हो।
सानि-सानि धूरि माटी
घरवा बनाइत हो
बारिश के पनिया में
नइया तैराइत हो
खेतवा में धान हम, बैठाइत सबके संगवा हो,
एक बार अउरौ अउतै, फिर से बचपनवा हो।
कूकति कोइलिया कै
कू - कू चिढ़ाइत हो
दौरी में बांध डोरी
चिरई फंसाइत हो
रंगि-रंगि चिरइया कै, उड़ाइत असमनवा हो,
एक बार अउरौ अउतै, फिर से बचपनवा हो।
चोर सिपाही खेलित
लुका छिपी खेलवा हो
दादा से लइकै पइसा
देखै जाइत मेलवा हो
नाही होतै चिंता फिकिर,उदास नाही मनवा हो,
एक बार अउरौ अउतै, फिर से बचपनवा हो।
याद आवै रहि रहि सारी
बचपन कै बतिया
उलझन में बीतै सारा
दिन और रतिया
सोंचि सोंचि इहै बतिया,तरसै इ परनवा हो,
एक बार अउरौ अउतै, फिर से बचपनवा हो।
पूछि पूछि कामे काजे
पियाइत सबकै पनिया हम
दौड़ि दौड़ि बड़ि बड़ि जनि कै
छुइत चरनिया हम
उहै दिन कै आज पल पल तरसै ला नयनवा हो,
एक बार अउरौ अउतै, फिर से बचपनवा हो।
दादी कहि कहानियां चंदा
मामा कै बुलउतै
दूध भात रोटी सानि सानि
कै खिलउतै
दौड़ि दौड़ि दूर तलक,खेलित हम अगनवा हो,
एक बार अउरौ अउतै, फिर से बचपनवा हो।
-रामवृक्ष बहादुरपुरी
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