हिमगिरि की ऊँची चोटी, भारत का अभिमान,
बर्फीली चोटियाँ कहतीं—देखो मेरा मान।
गंगाजल की निर्मल धारा, जीवन का उपहार,
हिमालय की गोदी में है, भारत का संसार।
सागर की लहरें गातीं, अनंत है विस्तार,
नीला-नीला आँचल ओढ़े, सिंधु अपार-पार।
तट पर सूरज रंग बिखेरे, मन हो जाए शांत,
भारत के सागर में मिलता, प्रकृति का सौगात।
थार की तपती रेतों में, जीवन का विश्वास,
धोरों पर जब सूरज ढलता, बदल जाता आकाश।
रेत सिखाती धैर्य हमें, आँधी देती ज्ञान,
मरुस्थल की हर एक लहर में, भारत की पहचान।
वन की हरियाली में बसती, धरती की मुस्कान,
पत्तों की सरसर में सुनिए, प्रकृति का मधुगान।
वन्यजीवन की हर धड़कन, जीवन का आधार,
जंगल भारत की साँसें हैं, इनसे धरती साकार।
योग हमारी शक्ति पुरानी, तन-मन का विज्ञान,
श्वास-श्वास में शांति जगाए, दे जीवन को ज्ञान।
आसन, प्राणायाम सिखाएँ, संतुलन का सार,
योग विश्व को राह दिखाता, भारत का उपहार।
अध्यात्म हमारी चेतना, भीतर का उजियार,
‘मैं’ से ‘हम’ तक राह दिखाता, करता मन विस्तार।
ऋषियों की चिंतन-धारा में, सत्य सनातन ज्ञान,
भारत की इस पुण्य धरा का, यही अमर सम्मान।
किले, महल और मंदिर कहते, बीते युग की बात,
शिल्प, कला और लोकपरंपरा, पीढ़ी-पीढ़ी साथ।
विरासत केवल पत्थर नहीं, संस्कृति का गान,
हर स्मृति में जीवित रहता, भारत का इतिहास महान।
मसालों की खुशबू लेकर, महके हर बाजार,
हर प्रांत की थाली कहती—आओ मेरे द्वार।
दाल, दही और धान से लेकर, मिठास भरा पकवान,
खानपान में बसता भारत, विविध रंगों की जान।
हिमालय से सागर तक है, रंगों का विस्तार,
वन से मरु तक, योग से लेकर, संस्कृति अपार।
भाषाएँ भले अनेक हमारी, एक हृदय, एक प्राण,
विविधता में एकता ही है, भारत की पहचान।
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