प्रायश्चित से मन हो पावन, दोष सभी मिट जाएं,
पुण्य की गंगा में नहाकर, आत्मशुद्धि पा जाएं।
उपनयन दीक्षा जीवन का, पावन एक चरण,
ज्ञान का दीप जलाकर, करें सत्य का वरण।
श्राद्ध कर्म से पितरों को, अर्पित करें प्रणाम,
तर्पण, सेवा, श्रद्धा से, दें उन्हें हम मान।
बिना सिले सफेद वस्त्र जब तन पर धारण हो,
सात्त्विकता की जोत जले, मन निर्मल दर्पण हो।
परिक्रमा से मिलती शक्ति, श्रद्धा का हो भाव,
धैर्य, भक्ति और प्रेम से, हो मंगल का नाद।
सोच और वाणी हो शुद्ध, कर्म भी हो निर्मल,
निष्कलंक जीवन जी सकें, मन के रहें विमल।
जब माला के हर दाने में, नाम प्रभु का आए,
चिंतन, ध्यान, और प्रेम से, आत्मज्ञान जगाए।
व्रत करें तो संयम सीखें, तप से मन संवारें,
साहस, धैर्य, और श्रद्धा से, सुख-संतोष उबारें।
दान पूर्ण हो परोपकार में, सबका हित बन जाए,
निर्धन, भूखे, दुखी जनों को, सेवा से सुख पाए।
धूप, दीप या गूगल जलाकर, करें शुद्ध परिवेश,
कुल देवता की आराधना से, पाएँ पुण्य विशेष।
इन दस कार्यों को अपनाकर, जीवन को संवारें,
धर्म, भक्ति, प्रेम से नाता, हर क्षण में उभारें।
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