*धनुषों का गौरवगान*
~डॉ रामानुज पाठक सतना म प्र
जब-जब धरती पर बढ़ा अधर्म,
जब काँपा मानव का विश्वास।
तब-तब धनुष उठे वीरों के,
बनकर साहस का इतिहास॥
पिनाक उठा जब शंकर के कर में,
त्रिपुरासुर का गर्व झुका।
एक हुंकार से दुष्ट मिटे,
सत्य का फिर सूरज चमका॥
कोदंड लेकर रघुवर निकले,
वन-वन मर्यादा साथ लिए।
रावण का साम्राज्य मिटाकर,
धर्म अमर कर हाथ दिए॥
गांडीव अर्जुन की पहचान बना,
कृष्ण-वचन का वह सम्मान।
कौरव सेना डगमगाई,
जीत गया फिर धर्म महान॥
शारंग विष्णु का दिव्य धनुष था,
दैत्य-दलन का था संकल्प।
जब भी डोली सृष्टि की नौका,
उसने थामा धर्म-विकल्प॥
विजय धनुष कर्ण का गौरव था,
शौर्य जहाँ सिर ऊँचा था।
पर अधर्म की राह चुनने से,
भाग्य स्वयं भी रूठा था॥
पुष्प धनुष था कामदेव का,
फूलों में भी शक्ति रही।
किन्तु शिव की तप-ज्वाला आगे,
उसकी सारी भक्ति ढही॥
भार्गव धनुष परशुराम का,
अन्यायों का काल बना।
जब-जब सत्ता मद में डूबी,
तब-तब वह विकराल बना॥
इंद्रधनुष नभ में मुस्काता,
सात रंग का पावन गीत।
सिखलाता—युद्धों से बढ़कर,
प्रेम, दया और जग की प्रीत॥
धनुष नहीं केवल शस्त्र मात्र,
यह चरित्र का होता मान।
जिसके हाथों सत्य सुरक्षित,
वही धारण करता धनुष महान॥
आज न पिनाक, न गांडीव है,
न कोदंड हमारे पास।
पर सत्य, साहस, प्रेम, करुणा—
इनसे जग में बनता इतिहास॥
चलो उठाएँ ज्ञान-धनुष अब,
वाणी को सत्बाण बनाएँ।
अन्यायों के अंधकार में,
मानवता का दीप जलाएँ॥
युग बदले, हथियार बदलें,
पर यह अमर विधान रहे—
धनुष वही सबसे महान है,
जिससे मानव का सम्मान रहे।
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