सबने अग्नि को साक्षी मान
सात फेरों में जीवन बाँध लिया,
हमने तो भीगते सावन की
खामोश बूँदों में अपना वचन साध लिया।
अग्नि तो तपना सिखाती है,
हमने बरसात से बहना सीखा;
उसने कहा—
"प्रेम वह नहीं जो जलकर राख हो जाए,
प्रेम वह है
जो हर ऋतु में धरती की प्यास बुझाए।"
हमने बादलों की छाँव तले
हथेलियों में हथेलियाँ रखीं,
बिजलियों की गूँज के बीच
धड़कनों की भाषा पढ़ी।
न कोई मंडप था,
न शहनाइयों का शोर,
बस भीगी हुई हवा थी,
और आँखों में भविष्य का भोर।
हमने कहा था—
जब भी जीवन की धूप
तुम्हें थका देगी,
मैं सावन बनकर लौटूँगा।
तुमने कहा था—
यदि कभी मेरी आँखों में
रेगिस्तान उतर आए,
तुम पहली बारिश बन जाना।
बारिश गवाह थी
कि हमने साथ चलने की बात की थी,
एक-दूसरे को बदलने की नहीं;
एक-दूसरे का आसमान बनने की थी,
किसी का पिंजरा बनने की नहीं।
लेकिन ऋतुएँ बदलती हैं...
सावन भी कभी-कभी
बिना बरसे लौट जाता है।
आज भी जब बादल घिरते हैं,
हर बूँद पूछती है—
"वे कसमें कहाँ हैं
जो हमारी गवाही में खाई थीं?"
मैं मुस्कुरा देता हूँ...
क्योंकि अग्नि के सामने ली गई प्रतिज्ञाएँ
राख होकर भी याद रह जाती हैं,
पर बारिश की गवाही में किए गए वादे
सूखते नहीं—
वे हर सावन फिर भीग उठते हैं।
शायद इसलिए
आज तक बारिश मुझे भिगोती नहीं,
टटोलती है...
मानो पूछ रही हो—
"वचन बदले थे,
या केवल मौसम?"
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