कभी कर लूं अधिग्रहण ,
समस्त विश्व का ,
ऐसा कुछ होता है मनवास ,
एक बनाऊं चाबी ,
जो हो दुनिया का चाबुक ,
कभी हो शान्त क्रियाहीन ,
मानो जीवन से उमंग छीन गयी हो ,
पीपल से बयार की भान्ति ,
जिन्दगी मौत से भी ठंडी,
हो जैसे कोई बिन मौसम फलो की मण्डी ,
जहाँ न कोई व्यापारी आये,
न ही आये कोई ग्राहक-दर्शक ,
उमंगे सिन्धु-ज्वार हो ,
काल अब तक का ही अपार हो ,
बस भाव-भावनाओ तक सीमित व्यापार हो ,
शेष जीवन क्षितिज हो पामीर पठार ,
सम्भावनाएँ पठार धरा में हों अपार ,
जुड़ा हो उनसे कितनो का समूल तारानतार ,
शायद यह गैर-तत्व ही ,
कर्तव्य का करता है धारणरूप ,
जिससे ही सम्भव हो पाता है पुनः नवसृजन,
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