कोई खड़ा हुआ ,
तो कोई ढल गया
किसी ने परिपाटियों के सीने पर ,
निश्चय दृढ़ का हल चला ,
उपलब्धि बेल उगायी ,
तो कोई निरंतर ऊंचे तल से ,
धंसता अवसान दलदल गया ,
परस्पर चलता यह कल गया ,
किन्तु अन्तिम कल का काल न आया ,
हर पल कुछ न कुछ नया ही पाया ,
इसे ही अब दुनिया का परिभाष्य कहें या कहें माया , जो कुछ भी है यही है ,
अब गलत या सही है ,
दुनिया अतीत में भी ऐसी ही रही है ,
इसको लेकर गयी बातें अनगिन्त कहीं है ,
और अनकही बातें अनगिन्त रह भी गई हैं ,
अब जो भी है ,
यही है ,
गलत या सही है .....!
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