आज के नेता निज भाषण में। कुछ भी कहकर चले जाते हैं,
काले कर्म सिर टोपी पहनकर देश भक्त कहलाते हैं।
आती जो पूंजी दिल्ली से उस पर श्वान कि भांति टूटते हैं,
न मिलता कुछ ग़रीबों को उनसे उनका अधिकार छीनते हैं।।
भले ही न हो गरीब शिक्षित पर ईमानदारी से जीते हैं,
अपने कठिन परिश्रम से अपना जीवन बिताते हैं।
तुम तो शिक्षित होकर भी काले कर्मों को करते हो,
देश कि सड़क बनाने में लाखों पैसे खा जाते हो।
ग़रीबों को न्याय दिलाने में करते न कोई भी युक्ति,
अपराधियों कि करते हो सिफारिश क्या यही है तुम्हारी देश भक्ति।
बड़े बड़े शहरों में जाकर विकास कि बातें करते हो,
सत्ता के लिए हिंसा फैलाते गांधी को आदर्श बताते हो।
जो दिखतों हो तुम बाहर से वास्तव में बो तुम्हारा भेष नही,
कभी आकर देखो गांवों में क्या गांव तुम्हारा देश नहीं।
ना आते गांवों में कभी कीचड़ गन्ध से डरते हैं,
दिल्ली कि गलियों में जाकर स्वच्छ भारत मिशन चलाते हैं।
भरे हुए तालाबों में क्यों व्यर्थ नीर को भरते हो,
कोई प्यासा भी बैठा है यह क्यों नहीं सोचते हो। निज स्वार्थों में हि केवल देश का विकास नहीं होगा,
यदि परोपकारता हो उर में तो कोई उदास नहीं होगा।
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