हे गिरा देवि है वीणा पाणि बस इतनी सी कृपा कर दे,
जनहित से सुन्दर विचारों को मेरे हृदय में भर दे।
मेरे अज्ञानमय पथ पर ज्ञान के सुन्दर दीप जला दें,
भटका बहुत हूं अंधेरों में अब प्रकाशमय मां डगर दिखा दे।
तेरी वीणा की झंकारों से शब्द गूंजते हैं जग में,
तेरी यदि कृपा हो मां शूल भी खिल जाए मग मैं।
मैं अभी बालक हूं मां फूल कांटों कि पहचान नहीं,
बना दे सच्चा मानव मुझको तू हेवान नहीं।
मेरी कविता के शब्द शब्द में मां तेरा ध्यान मिले,
जहां भी मेरा जन्म हो मुझको वतन हिन्दुस्तान मिले।
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