पर्वत छोड़ो पंथ हमारा, हमको पढ़ने जाना है।
बंद करो अब बाल मजूरी किस्मत गढ़ने जाना है।
मन में अब अरमान भरे हैं नभ में पंख पसारे हम,
चंदा हो या तुंग हिमालय हमको चढ़ने जाना है।
मानव भाग्य बनाता खुद ही कहते जग के ज्ञानी
फटे हुए इस मन मृदंग को मुझको मढ़ने जाना है।
छोड़ेंगे बारूद बनाना या होटल के जूठन को
पथ को घेरे सघन कुहासे उनसे कढ़ने जाना है।
सुन ले अब सरकार हमारी हम भी साक्षर बन जाएं
कंधे पर बसते को लेकर आगे बढ़ने जाना है।
रामप्रवेश पंडित
मेदिनीनगर पलामू झारखंड
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