ऐसा नहीं पिंजरे में सुहूलत नहीं मिलती।
इक पंछी को उड़ने की इजाज़त नहीं मिलती।
बस एक ही नुकसान है सौदे में वफ़ा के,
इसमें नफ़ा तो छोड़िए लागत नहीं मिलती।
खंज़र की तरह चुभते हैं सीने में मुसलसल,
जिन अश्कों को बहने की इजाज़त नहीं मिलती।
चलती है जब हर शय जहां में अपने मुताबिक,
फिर क्यूं भला इंसाँ को ये राहत नहीं मिलती।
रब की रज़ा को मान लें जो अपना मुक़द्दर,
उनके लबों पे "अल्प" शिकायत नहीं मिलती।
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