"सारथी"
भीड़ भरी इस अंधी दौड़ में,
जब मन का कुरुक्षेत्र घबराए,
सपनों के भारी बोझ तले,
जब अर्जुन फिर से थरथराए;
काश थाम लेते तुम वो डोर,
कहते—"उठ, मत हो विवश,
कर्म ही तेरी पहचान है,
छोड़ व्यर्थ का यह संशय।"
आज न बाण हैं, न गांडीव,
न सम्मुख कोई कौरव दल,
यहाँ जंग है अपनी ही ख़ामियों से,
और उलझा हुआ सा हर एक पल।
डिग्रियों और मुक़ाबलों के बीच,
जब थककर बैठ जाती है आस,
तुम्हारी एक धीमी सी मुस्कान,
भर देती जीवन में फिर एक नवचेतन नवविश्वास।
यदि होते तुम आज भी साथ,
तो शायद स्मृति के उस पार न खोते,
तुलना की इस अंधी आग में,
यूँ तिल-तिल हम न रोते।
सिखाते कि मंज़िल से बढ़कर,
सफ़र में ईमानदारी ज़रूरी है,
हर हार कोई अंत नहीं,
बस अगली जीत की तैयारी है।
थाम लो हमारे भटके मन की लगाम,
हे कृष्ण! बनो आज फिर सारथी,
दिखाओ राह उस आत्मबल की,
जिसकी यह नई सदी है प्रार्थी।
टूटे पंखों में भर दो वो उड़ान,
जहाँ हर अंधियारा छंट जाए,
कर्म की लौ जलती रहे सदा,
और उम्मीद का नया सूरज मुस्काए।
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