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हिन्दी भाषा की कहानी

                
                                                         
                            ऋग्वेद के छंदों से उपजी, उपनिषद् की यह वाणी है,
                                                                 
                            
भारत की धड़कन का स्पंदन, भाषा नहीं, अमर कहानी है।

आदिकाल से आज तलक का, इतिहास समेटे बैठी है,
यह हिंदी माँ युग-युगांतर, हर कंठ में गूंजती रहती है।

जब *आदिकाल* की भूमि सजी, रासो का रण-बाना गूंजा,
चंदबरदाई की रचना में, पृथ्वीराज का माना गूंजा।
वीरगाथा के शोणित से, हिन्दी का भाल सजा था तब,
रणबांकुरों के तीरों सा, शब्दों का वेग बढ़ा था तब।

फिर *भक्तिकाल* की धारा बही, अमृत रस छलका जग में,
कबीर की साखी ने तोड़ा, पाखंड जगत के मग में।
सूर की बाँसुरी पर नाची, ब्रजमंडल की हर इक गागर,
तुलसी ने मानस रच कर के, भर दी करुणा की सागर।
मीरा के विरह पदों में तो, गिरधर का रूप समाया था,
भक्ति के इस पावन तट पर, हर प्राणी मुक्ति पाया था।

फिर आया *रीतिकाल* जहाँ, नैनों के तीर चले ऐसे,
बिहारी के दोहों में जैसे, गागर में सागर पले जैसे।
केशव और भूषण की वाणी ने, तलवारों सी धार धरी,
वीर रस और श्रृंगार मिश्रित, इस हिन्दी ने जयकार करी।

फिर भारतेंदु ने आकर के, सोया इतिहास जगाया था,
'निज भाषा उन्नति अहै', यह मंत्र सबको समझाया था।
यहीं से *आधुनिक काल* खुला, गद्य और पद्य के द्वारों पर,
नयी चेतना उतर पड़ी, भारत के जन-जन के प्रानों पर।

द्विवेदी युग में मैथिलीशरण ने, साकेत महाकाव्य गाया,
यशोधरा के चरणों में झुक, भारत का मस्तक लहराया।

फिर छायावाद के अंबर पर, अदभुत चार सितारे चमके,
जिनकी कोमल अनुभूतियों से, मरुस्थल भी प्रेम से दमके—
प्रसाद की कामायनी गूँजी, निराला का ओज महान हुआ,
महादेवी के नीरव आँसू से, मानस का कोना प्राण हुआ,
और सुमित्रानंदन पंत की वाणी में, प्रकृति थिरक उठी जग की,
छायावादी इस कुंदन से, चमकी किस्मत भारत मग की।

फिर प्रगति और प्रयोगों के, नए सोपान चढ़े आगे,
दिनकर की हुंकार उठी तो, सिंहासन डोल गए भागे।

'रश्मिरथी' और 'हुंकार' ने, सोए हुओं को ललकारा,
अज्ञेय की तार सप्तक ने, बौराया मन हरकारा।

माखनलाल की पुष्प अभिलाषा, स्वतंत्रता की बलिबेदी थी,
हरिवंशराय बच्चन की मधुशाला, इस जीवन की पेदी थी।

आज तलक यह यात्रा अपनी, नित्य नूतन हो चलती है,
डिजिटल युग के पन्नों पर, हिंदी अक्षत सी पल्टी है।
ऋग्वेद से लेकर के यह, सोशल मीडिया तक आई है,
भारत की हर धड़कन ने इसको, माँ कहकर अपनाई है।

यह केवल भाषा नहीं हमारी, पहचान देश की मान है,
हिंदी से ही भारतवर्ष का, उज्ज्वल ऊँचा प्राण है।
-राकेश रंजन
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8 घंटे पहले

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