भोर की पहली किरण जब पत्तों को छूती है,
घास पर बिखरे मोतियों की नमी हमें अच्छी लगती है।
शहर के शोर से दूर, किसी पगडंडी के मोड़ पर,
ठंडी, बेफिक्र हवा की हर छुअन हमें अच्छी लगती है।
हमें अच्छा लगता है मिट्टी की सौंधी खुशबू में खो जाना,
पहली बारिश की बूँदों का चुपके से धरा को सहलाना।
शाखों पर बैठे पंछियों का वह मधुर तराना,
बिना किसी सुर-साज़ के दिल को छू जाना।
गिलहरियों का फुदक फुदककर खेलना,
मैना का ईठलाकर मटककर चलना, अच्छा लगता है।
नदियों का पत्थरों से टकराकर बहना अच्छा लगता है,
झरनों का बेपरवाह संगीत बनकर गिरना अच्छा लगता है।
नीले आसमान तले हरी-भरी वादियों का विस्तार,
जहाँ हर साँस में घुलता है प्रकृति का अपार प्यार।
सूखे पत्तों पर चलने की वह धीमी सरसराहट,
फूलों की पंखुड़ियों पर तितलियों की वो आहट।
पेड़ों की घनी छाँव में सुस्ताते हुए पल,
जहाँ कल की कोई चिंता नहीं, बस आज का निश्छल जल।
यह सादगी, यह ठहराव, यह अनकहा सुकून,
जहाँ दौड़ती ज़िंदगी भी भूल जाए हर जुनून।
ईश्वर की इस अनमोल रचना के बीच ठहरना,
हाँ, प्रकृति की इसी गोद में जीना हमें अच्छा लगता है।
-राकेश रंजन
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