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इक इक शाम मेरे खयाल में

                
                                                         
                            *इक इक शाम मेरे खयाल में*
                                                                 
                            

माँ तो फिर माँ होती है
कितना भी भ्रम में जी लें
काम काज के बवंडर पी लें
हरारत भरी जिंदगी में,
चाय कॉफी की चुस्की ले लें
थक हार के जब शाम होती है
थपकी सी माथे पे दें,
वो सुकून के पल आ संजोती है
माँ तो फिर माँ होती है

माँ तो फिर माँ होती है
आसपास के हर उस सवाल पर
तीखे कड़वे हर बवाल पर
चाहे ग़म में हो हर चिंतन अपना
हर बांधा की नय्या खोती है
इक इक शाम मेरे खयाल में
मरहमी संसार संजोती है
माँ तो फिर माँ होती है

माँ तो फिर माँ होती है
उलझी लिपटी संकट दौर में
आते जाते फिसलन होड़ में
भागती दौड़ती इस अंध दौड़ में
ममत्व वो चक्षु ज्योति है
कांटों के इस विशाल विश्व में
चुन लाती वो हर मोती है
माँ तो फिर माँ होती है

माँ तो फिर माँ होती है

-राकेश रंजन
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एक महीने पहले

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