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दिल भारी हो तो

                
                                                         
                            दिल भारी हो तो लिखना ही दवा है,
                                                                 
                            
हर हर्फ़ कागज़ पे उतरे हवा है।

लबों ने जो बात कभी कही नहीं,
क़लम ने वही कह दी, वो वफ़ा है।

ज़माना दे के ज़ख़्म पूछता है हाल,
यहाँ मरहम कहाँ, बस नमक सदा है।

किसी ने न सुना, कोई पास न आया,
फ़क़त कागज़ ही तो साथ खड़ा है।

बिखरा पड़ा था मैं टुकड़ों में जब से,
लिख लिख के खुद को फिर से बुना है।

लिख ऐ 'ऋषि' कि मिल जाए खुद से खुदी,
इसी लफ्ज़ में जीने का मज़ा है...
-राकेश कुशवाहा 'ऋषि
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46 मिनट पहले

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