हमने भी दिल लगाया था कभी किसी से, फिर क्या, टूट गया!
और ये दिल लगाने का सिलसिला, वही छूट गया !!
फिर सोचा, दिल लगाऊं खुदा में, खुदा बोला, पहले मेरे पास क्यों नहीं आया, वो इस बात पे रूठ गया!!!
और ये दिल लगाने का सिलसिला, फिर वही छूट गया!!!!
फिर सोचा, दिल लगाऊं किताबों से, पन्ने बोले, हमें पढ़कर भी जनाब क्या पाएंगे,
जो खुद को न पढ़ सका, उसे हम क्या सिखाएंगे, ये वहम भी टूट गया!
और ये दिल लगाने का सिलसिला, फिर वही छूट गया!!
गया महफ़िल में कि बहल जाए ज़रा ज़ख्मी दिल मेरा,
पर वहां हर शख्स अपनी ही तन्हाई के साए में गुम था,
लगा मेरी एकतरफा मोहब्बत में ग़म, उनसे तो थोड़ा कम था!
और ये दिल लगाने का सिलसिला, फिर वही छूट गया!!
आख़िर में थक कर बैठा जब खुद के साए में, तो तन्हाई मुस्कुरा कर बोली,
"मैं तो सदा से तेरी थी, तू खामखां दुनिया में वफ़ा तलाशने की ज़िद में खुद से भी टूट गया..."
लो आज आख़िरकार, ये दिल लगाने का सिलसिला, क़यामत तक के लिए छूट गया!!
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