कविता का गुलाम हूँ, अल्फ़ाज़ों का माहताब हूँ,
बांध सके न कोई बंधन, मैं वो स्वच्छंद ख़्वाब हूँ।
मर्यादा की पराकाष्ठा, मैं सीता का राम हूँ,
प्रतीक्षारत माँ की आँखों का, मैं ही घनश्याम हूँ।
भाई का अटूट विश्वास, मैं बलराम हूँ,
बहन की रक्षा को सज्ज, कृष्ण घनश्याम हूँ।
मोह-माया से परे, मैं तृष्णा से मुक्त हूँ,
जनक सा धीर-वीर, बेटियों का भक्त हूँ।
पुत्र-मोह में तड़पता, दशरथ सा भूप हूँ,
अणु सा सूक्ष्म हूँ मैं, ब्रह्मांड का ही रूप हूँ।
दृष्टि भी मैं ही हूँ, और मैं ही दृष्टांत हूँ,
पर्वतों का शिखर कैलाश मैं, असीम शांत हूँ।
बहता समंदर हूँ मैं, असीम और अनंत,
जिसकी कोई सीमा नहीं
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