तुम पूनम का चाँद प्रिये,
में उसमें लगा दाग प्रिये,
तुम मधुर धुन बासुरी की,
में बेसुरा राग प्रिये,
तुम निश्छल बहती नदी हो,
में जंगल की आग प्रिये,
तुम वृक्ष की शीतल छाया,
में दोपहरी का ताप प्रिये,
तुम चन्दन का वृक्ष हो,
में उसपर लिपटा नाग प्रिये,
तुम फूल हो गुलाब का,
में उस पर काटो का ताज प्रिये,
तुम वीणा धारक सरस्वती,
में जंगली दस्यु साज प्रिये,
तुम शिखर कैलाश का,
में पाताल की खाई प्रिये,
तुम माता पार्वती सी,
में शिव बदन की राख प्रिये,
में एक सूक्ष्म अणु सा,
तुम समस्त ब्रह्मांड प्रिये,
में पापी निशाचर,
तुम सद्गुण कर्मकांड प्रिये,
तुम स्वर्ण सी अलौकिक,
में तुच्छ मर्दभांड प्रिये,
तुम सर्वगुण संपन्न,
में रावण का अभिमान प्रिये!
तुम तपस्या दुर्वासा की,
में कुंती का अज्ञान प्रिये,
तुम कृष्ण सी सर्वज्ञ,
में कर्ण सा अनजान प्रिय,
तुम गांडीव सी तेजस्वी,
में तूणीर बिन मान प्रिये,
में दुर्योधन की जंघा,
तुम भीम गदा समान प्रिये,
में लोलुपता धृतराष्ट्र की,
तुम पाण्डु का त्याग प्रिये,
में अंधकार गांधारी का,
तुम कुंती का भाग प्रिये,
मे वन में भटकता एकलव्य,
तुम अर्जुन-भाग प्रिये,
में अश्वत्थामा सा अभागी,
तुम सुभद्रे भाग्यवान प्रिये,
में कुटिलता दुर्योधन की,
तुम बाल-ग्वाल सहज प्रिये!
में राधे सा पीछे छूटा हूँ,
तुम रुक्मिणी-संग राज प्रिये ,
में अतीत का साया हूँ,
तुम वर्तमान की भेट प्रिय,
ना काल मिले, ना लेख मिले,
फिर कैसे संभव योग प्रिये!
गुण-दोष विपरीत दिशा,
कैसे हो संजोग प्रिये !
तुम अच्छाई से खुश रहो,
हम बुराई में राजी रहते है,
तुम भगवन-भगवन रटते रहो,
हम काज़ी-काजी कहते है,
तुम कोशिश में रहो, ओझल होने की,
हम खोज में बने रहते है!
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