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मोहब्बत का मज़हब चला दो

                
                                                         
                            देर मत करो, आवाज़ से आवाज़ मिला लो
                                                                 
                            
रोशनी जो उठी है, उसे सुबह बना लो

हर फूल में खिलने की उम्मीद जगा दो
चमन में अधिकारों का दस्तूर चला दो

सब्र टूट चुका है, अब अंधेरे को अंधेरा बता दो
लाखों दीप जो जल रहे हैं, आसमाँ सजा दो

जहाँ झूठ मेहमाँ हो, वहाँ सच की दस्तरख्वान बिछा दो
जहाँ अँधेरे शहंशाह हों, उजालों की दुनिया बसा दो

संविधान के छप्पर तले, इंसानियत की अलख जगा लो
जहाँ बुलडोज़र चले हों, नई बस्तियाँ बसा दो

माटी में पनपती करोड़ों कहानियाँ सुना दो
हरी-भरी इन फसलों की क़ीमत पूरी बता दो

जो जान दाँव पर लगाएं हैं, उनका मान बढ़ा दो
टीयर गैस से रोई आँखों में, देश का आब दिखा दो

इस बेज़ार चमन को, पलकों से संवार दो
ज़मीं यहाँ घायल है, मोहब्बत का मज़हब चला दो
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एक घंटा पहले

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