एक दिनजब मेरी ख़ामोशी का हिसाब होगा,
लोग मेरे अल्फ़ाज़ नहीं,
मेरे सब्र को पढ़ेंगे।
और शायद तब समझेंगे—
सबसे गहरे ज़ख़्म
हमेशा दिखाई नहीं देते।
कुछ दर्द
दुआओँ की तरह सीने में उतर जाते हैं,
न कोई आह निकलती है,
न कोई इल्ज़ाम जन्म लेता है।
मैंने शिकवों को
लबों तक आने ही नहीं दिया,
क्योंकि हर सचबोल दिया जाए,
तो रिश्तों की उम्र कम पड़ जाती है।
जो मुझे हँसता हुआ देखकर
मेरी दुनिया का अंदाज़ा लगाते रहे,
उन्हें क्या मालूम—
कुछ लोग मुस्कुराते नहीं,
अपने टूटने को छिपाते हैं।
और जब आख़िरी बार
मेरे हिस्से की ख़ामोशी भी रुख़्सत होगी,
तब शायद वक़्त लिखेगा—
कि यह आदमी हारकर नहीं गया था,
बस अपने दर्द का तमाशा
कभी बनने नहीं दिया।
-विकास कुमार
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