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ज़िंदा क़ौम

                
                                                         
                            जो ज़िंदा भी थे, वो मर गए,
                                                                 
                            
जो मर गए, वो मुर्दा थे,
ख़ुद ही ख़ुद ही बोली लगाते रहे,
तो क्या ख़ाक ज़िंदा थे!

आंखें खुली हों पर दिखाई न दे,
यह रतौंधी का असर है,
अक़्ल बंद हो और दिखाई सब दे,
वहाँ हर दवा बे-असर है.

ख़ुद मुख़तारी नायाब इक चीज़ है,
ज़िम्मेदारी तो समझिये,
शक़्ल क्यूँकर दूसरों की ताकिये,
कभी अकेले भी निकलिये.

ताक़त पैसे से नहीं तालीम से आती है,
तालीम शख़्सियत का वज़न बढ़ाती है,
गर तालीम और अक़्ल बटे ज़रुरतमंदों में,
तो ये अगली नस्लों के बड़े काम आती है.

ख़्वाब कल के छोड़कर आज को देखिये,
ख़्वाबों को तो खा गए भूखे भेड़िये,
मरम्मत कीजिये घर की चाहरदिवारी की,
मशाल हो तभी ततईयों को छेड़िये.

महफूज़ है वह कौम जिसकी सोच ज़िंदा है,
मज़बूत पंखों पर ही उड़ता परिंदा है,
भिखारी के बच्चों ने कभी मलमल नहीं देखी,
टुकड़ों पे पली नस्ल पैदाइशी मुर्दा है.

 
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2 महीने पहले

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