जाने क्यूँ लोग इस क़दर ख़ुद की
महब्बत में मुबतिला रहा करते हैं,
चंद लमहों के सुरुर के लिए
दुनिया को ज़हर दिया करते हैं,
ये तख़्त, ये ताज, और ये ताक़त के
तमाम तामझाम करने वाले,
ख़ाकसारों के कंधों पे चढ़ कर ही
सुपुर्द-ए-ख़ाक हुआ करते हैं.
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