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मेरी कई मंज़िला तरक़्क़ी की मुंडेर पर है

                
                                                         
                            मेरी कई मंज़िला तरक़्क़ी की मुंडेर पर है
                                                                 
                            
आता रोज़ रुपहला सूरज,
बगल के प्लॉट से हर वक़्त उगलती है
धुआँ चिमनी बनकर ख़ूबसूरत,
ऐसी आरामगाह की आराम कुर्सी पर लेट
मैं बेफिक्र देखता हूँ फोन पे ख़बर,
कहीं मेरे पड़ोस में औरतों और बच्चों को है
रोटी और दूध की बेइंतेहा ज़रुरत.

 
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एक महीने पहले

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