मेरी कई मंज़िला तरक़्क़ी की मुंडेर पर है
आता रोज़ रुपहला सूरज,
बगल के प्लॉट से हर वक़्त उगलती है
धुआँ चिमनी बनकर ख़ूबसूरत,
ऐसी आरामगाह की आराम कुर्सी पर लेट
मैं बेफिक्र देखता हूँ फोन पे ख़बर,
कहीं मेरे पड़ोस में औरतों और बच्चों को है
रोटी और दूध की बेइंतेहा ज़रुरत.
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X