कलयुग के काल में रावण का रुप
कहीं अधिक कुरुप है,
आधुनिक समाज में राक्षसी भंगिमा
कहीं अधिक विद्रूप है,
छद्म मुखौटे लगाए वानरी मनुष्यता
भटक रही दिशाहीन,
राम की परिधि से विलग होती धरा का
यह वीभत्स स्वरुप है.
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