चाहे दूर से ही नमन कर लीजिये
यदि हृदय में श्रद्धा हो,
ज़रूरी भी नहीं कि आपका
हर दरवाज़े पे सजदा हो,
सत्य, सुकर्म व सदआत्माऐं ही
भाते हैं 'उसको' सदा,
पूजा, नमाज़, गुरुसेवा उसी की फलित हैं
जो नम्रता में झुकता हो.
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