देखता है तू बैठकर मुंडेर पर दिन में,
आने वाले कल के सपने,
बरसों की जमा पूंजी लूट ले गये वह,
समझा था तूने जिन्हें अपने,
सचमुच बड़ा मुश्किल होता है जीना
देखे बग़ैर सपनों के,
लूटकर तेरे सपनों को लुटेरा अब मगर,
लगा है सच की माला जपने.
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