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बादल की व्यथा

                
                                                         
                            कौन जाने व्यथा आवारा बादल की,
                                                                 
                            
यह सदा एकल ही डोलता,
ऊपर गर्माता आकाश नीचे धरती की प्यास,
लिए अपरिमित भार वर्षा का
चिंतित सा आकाश-आकाश घूमता,
रुआं-रुआं बिखरता-सिमटता
इसका व्यक्तित्व अनंत रुपों में निखरता,
दूसरों की वेदना से व्यथित बादल,
अपरिचित सा परिचित संसार को निरखता,
यूँ तो हर ऋतु से इसका है परिचय,
किंतु वर्षा से संबध इसका घना है,
यदि साथ हो वर्षा तो सूर्य को भी धता है,
मदमस्त हो बरसता धरती पर,
रखता कहीं सूखा कहीं गली गली ज़लज़ला है,
वर्षा भी कहाँ टिकी है संग इसके,
विरह की अग्नि में यह बारम्बार गला है,
कौन जाने व्यथा बादल की,
यह सदा एकल ही रहा है.

 
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3 महीने पहले

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