रिमझिम-रिमझिम बरसे बदरा, महके हर आँगन-द्वार,
गरम पकौड़े, चाय की प्याली, सावन का त्योहार।
भीगे मौसम की बाँहों में, मन गाए हर बार,
गरम पकौड़े, चाय की प्याली, सावन का त्योहार।
मिट्टी की सौंधी खुशबू ने, छेड़ा मन का राग,
पत्तों पर मोती मुस्काएँ, भीग उठे सब बाग।
खिड़की पर बैठी पुरवाई, गाए मधुर मल्हार,
गरम पकौड़े, चाय की प्याली, सावन का त्योहार।
छत पर नाचे बूँदों की टोली, गली-गली उल्लास,
भीगे चेहरे, भीगी हँसी में, खिल जाए विश्वास।
अपनों संग बीते जो पल, लगते हैं उपहार,
गरम पकौड़े, चाय की प्याली, सावन का त्योहार।
न कोई दौलत, न कोई शोहरत, बस इतना-सा मान,
अपने हों, कुछ मीठी बातें, और स्नेहिल मुस्कान।
छोटी-छोटी खुशियों से ही, महके सारा संसार,
गरम पकौड़े, चाय की प्याली, सावन का त्योहार।
रिमझिम बरसे प्रेम की बूँदें, भीगें तन और मन,
हर सावन यह याद दिलाए, जीवन कितना धन।
मौसम चाहे लौट न लौटे, याद रहे हर बार,
गरम पकौड़े, चाय की प्याली, सावन का त्योहार।
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