मानस के हर अक्षर-अक्षर में, राम तुम्हारा नाम,
मर्यादा की ज्योति अमर है, युग-युग जीवित राम।
करुणा, सत्य, प्रेम, तपस्या—तेरा दिव्य विधान,
मानवता के पथ-प्रदर्शक, वंदन तुमको राम॥
त्याग जहाँ मुस्काता बनकर, राजमुकुट से वन की राह,
पिता-वचन की पावन रक्षा, बन जाती जीवन की चाह।
धर्म नहीं केवल उपदेशों में, कर्मों का अभिराम,
मानस के हर अक्षर-अक्षर में, राम तुम्हारा नाम॥
शबरी के श्रद्धा-फल में तुम, निर्मल प्रेम का मान,
केवट की विनम्र हथेली में, देखा अपना सम्मान।
दीन-हीन के आँसू पोंछे, बनकर करुणा-धाम,
मानस के हर अक्षर-अक्षर में, राम तुम्हारा नाम॥
मित्र बने वनवासी जन के, शत्रु का भी मान रखा,
रण में धर्म-विजय का ध्वज था, क्रोध नहीं अभिमान रखा।
शौर्य जहाँ विनय से मिलता, होता वहाँ विश्राम,
मानस के हर अक्षर-अक्षर में, राम तुम्हारा नाम॥
तुलसी की वाणी में गूँजा, जीवन का अनुपम सार,
राम नहीं केवल आराध्य, जन-मन का आधार।
जब तक सत्य धरा पर जीवित, गूँजे तेरा गान,
मानस के हर अक्षर-अक्षर में, राम तुम्हारा नाम॥
आओ अपने अंतर्मन में, फिर से दीप जलाएँ,
रामचरित के पावन पथ पर, जीवन सफल बनाएँ।
मर्यादा की गाथा गाता, भारत का अविराम—
मानस के हर अक्षर-अक्षर में, राम तुम्हारा नाम॥
-राजेश्वरी पंत जोशी
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