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कौन फिर भीगी रात में

                
                                                         
                            कौन फिर भीगी हुई आवाज़ में आया होगा,
                                                                 
                            
रात के दिल ने कोई ख़्वाब सजाया होगा।

हमने खिड़की से बहुत देर तलक बारिश सुनी,
बूँद ने चुपके से कोई राज़ बताया होगा।

चाँद बादल की पनाहों में बहुत देर रहा,
उसने भी दर्द कोई दिल में छुपाया होगा।

एक छतरी में सिमटकर जो गुज़रते थे कभी,
वो सफ़र आज भी पलकों पर सजाया होगा।

भीगती शाम ने जब चाय की ख़ुशबू ओढ़ी,
कोई भूला हुआ लम्हा भी महक आया होगा।

रात भर पेड़ से गिरती रहीं ख़ामोश बूँदें,
पत्ते ने किसी आहट को बुलाया होगा।

हम भी ख़ामोश रहे, बारिश भी कुछ बोल न सकी,
इश्क़ हर बार कहाँ लफ़्ज़ों में सजाया होगा।

सुबह आई तो धूप ने सब निशाँ धो डाले,
दिल में भीगा हुआ मौसम मगर छुपाया होगा।
-राजेश्वरी पंत जोशी
 
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2 महीने पहले

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