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एक शाम

                
                                                         
                            एक शाम तेरे ज़िक्र में यूँ गुज़र गई,
                                                                 
                            
खिड़की अँधेरी हुई और आँख रोशन रही।

लफ़्ज़ थक कर सो गए काग़ज़ की सिलवटों में,
दिल की ख़ामोश दास्ताँ मगर धड़कन में रही।

चाँद छत पर देर तलक तन्हा टहलता रहा,
रात तेरी याद की चादर में लिपटी रही।

हमने बुझते हुए सूरज को बहुत देर तक देखा,
तेरी तस्वीर निगाहों में कहीं ठहरी रही।

बारिशों ने धो दिए शहर के सारे रास्ते,
एक पगडंडी तेरे घर की मगर ज़िंदा रही।

वक़्त बहता रहा दरिया की तरह आँखों से,
तेरी यादों की कोई नाव किनारे ठहरी रही।
-राजेश्वरी पंत जोशी
 
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2 महीने पहले

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