आँसू ना होते तो आँखें इतनी हसीन कहाँ होती,
दर्द ना होता तो खुशियों की तासीर कहाँ होती।
रात की ठंडक में ही चाँदनी का जादू खिलता है,
धूप हर वक्त रहे तो फिर वो नज़ीर कहाँ होती।
जो भी मिला है यहाँ, सब सब्र की राहों से मिला,
बस चाहने से मिल जाए, ऐसी तक़दीर कहाँ होती।
ठोकरें खाकर ही इंसान संभलना सीखता है,
वरना हर कदम पर इतनी तदबीर कहाँ होती।
और जो ऊपर वाला है, वही तो राज़े-हस्ती है,
उसके बिना इस दुनिया की तामीर कहाँ होती।
आँसू न होते तो आँखों में वो रौनक कहाँ होती,
दर्द न होता तो खुशियों की वो क़ीमत कहाँ होती।
रात के दामन में ही चमकता है चराग़-ए-उम्मीद,
दिन ही दिन होता तो दिल को वो राहत कहाँ होती।
मिल जाता गर हर एक ख़्वाहिश पे मंज़िल का पता,
इश्क़ में फिर किसी साज़िश की ज़रूरत कहाँ होती।
ठोकरें खा के ही इंसाँ को हुनर आता है जीने का,
वरना तदबीर की राहों में वो हिकमत कहाँ होती।
और जो तू है, वही तो राज़ है इस काइनात का,
तेरे बग़ैर इस जहाँ की कोई सूरत कहाँ होती।
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