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लिखता हूं

                
                                                         
                            ऐसे तो मैं अक्सर लिखता हूँ,
                                                                 
                            
लिखता हूँ अक्सर जग के फ़साने को,
लिखता हूँ अक्सर तुम्हारी दास्तान को।
पर लिखता नहीं हूँ कभी खुद को,
डर लगता है कहीं कोई पढ़ न ले।

फिर भी,
अगर कभी लिखूँगा अपने बारे में तो
शुरुआत होगी खाली जेब से,
शुरुआत होगी फटे बनियान से,
शुरुआत होगी बासी रोटी और प्याज से,
शुरुआत होगी जूट के बोरे में लिपटी स्लेट से,
शुरुआत होगी कीचड़ से लथपथ नंगे पाँव से।

शुरुआत होगी — आँखों में नींद नहीं है,
शुरुआत होगी — लालटेन में तेल नहीं है,
शुरुआत होगी — जुगनू भी आज बीमार है,
शुरुआत होगी — चाँद की रोशनी भी आज मद्धिम है।

लेकिन फिर भी लिखूँगा खुद को एक दिन,
और फिर पूछूँगा खुद से —
कहीं कुछ छूट तो नहीं गया ?
या कहीं कुछ ज़्यादा ही लिख तो नहीं गया?

मुझे मालूम है इसका प्रत्युत्तर भी।
लोग पूछेंगे मुझसे — प्रेम नहीं लिखा ?
लोग पूछेंगे मुझसे — विरह नहीं लिखा ?
लोग पूछेंगे मुझसे ----वफा नहीं लिखा ?
लोग पूछेंगे मुझसे — एक भी सच नहीं लिखा ?
पर मैं मौन रहूँगा,
बचना चाहूँगा परत-दर-परत खुलने से,
क्योंकि मुझे मालूम है —
गरीब से प्रेम करता कौन है।
बीते लम्हों पर विश्वास करता कौन है।
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2 महीने पहले

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